हरिद्वार : श्रीभक्तिवेदांत सिद्धान्ती महाराज जी द्वारा गोविंदघाट पर श्रीमद्भागवत कथा के दुसरे दिन भगवान श्री विष्णु जी के वामन अवतार का स्मरण किया गया स्वामी जी ने सभी भक्तों को बताया की
वामन अवतार भगवान विष्णु का पांचवां और त्रेतायुग का पहला अवतार है, जिसमें उन्होंने ऋषि कश्यप और माता अदिति के घर बौने ब्राह्मण के रूप में जन्म लिया। इसका मुख्य उद्देश्य राजा बलि के अहंकार को नष्ट कर देवराज इंद्र को उनका खोया हुआ स्वर्ग वापस दिलाना था। वामन रूप में विष्णु ने बलि से तीन पग भूमि मांगकर, दो पग में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल भेज दिया। स्वामी जी ने बताया राजा बलि जब नर्मदा तट पर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। वामन देव ब्राह्मण का रूप धरकर वहां पहुंचे बलि ने वामन से कुछ मांगने को कहा। वामन ने सिर्फ अपने तीन पग के बराबर भूमि मांगी। दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वामन की चाल को समझ लिया और बलि को मना किया, लेकिन बलि ने वचन का पालन करते हुए संकल्प ले लिया। जैसे ही संकल्प पूरा हुआ, वामन ने अपना विराट रूप धारण किया। और उसके बाद पहले पग में पूरी पृथ्वी, और दूसरे पग में स्वर्ग-पाताल सब नाप लिया।अब तीसरा पग रखने को जगह नहीं थी। तब राजा बलि ने वामन देवता को कहां आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दो भगवान ने अपना पग उनके सिर पर रख दीया बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल का राजा बना दिया और उनके द्वारपाल बने। स्वामी जी ने बताया यह कथा हमे सिखाती है कि घमंड हमेशा हारता है और भगवान अपने भक्तों के वादे के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं।
