हरिद्वार : योग विज्ञान विभाग, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार एवं योग अध्ययन केंद्र, हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के संयुक्त तत्वावधान में “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्राकृतिक एवं वैकल्पिक चिकित्सा का स्वास्थ्य संरक्षण में योगदान” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला का सफल आयोजन उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर हरिद्वार में किया गया। कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों से आए विशेषज्ञों, शोधार्थियों, छात्रों तथा स्वास्थ्य एवं योग क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लेकर विभिन्न आयामों पर अपनी सारगर्भित प्रस्तुति दी।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक वैदिक मंगलाचरण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। स्वागत भाषण में आयोजक सचिव प्रो० लक्ष्मीनारायण जोशी, डीन आधुनिक ज्ञान विज्ञान एवं विभागाध्यक्ष – योग विज्ञान विभाग एवं प्राकृतिक, योगिक, आयुर्वेदिक तथा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान दौर में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के समाधान हेतु समग्र दृष्टिकोण को अपनाना समय की महत्वपूर्ण मांग है ।कार्यक्रम के सह सचिव डॉ० चर्चित कुमार बालियान ने संगोष्ठी की उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय में प्राकृतिक एवं वैकल्पिक चिकित्सा के द्वारा गम्भीर से गम्भीर बीमारियों को जड़ से ख़त्म किया जा सकता है।वर्तमान समय में इसके प्रचार – प्रसार की महती आवश्यकता है ।
मुख्य अतिथि प्रो० ईश्वर भारद्वाज, डीन एकेडमी, देव संस्कृति विश्वविद्यालय हरिद्वार उत्तराखंड ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्राकृतिक एवं वैकल्पिक चिकित्सा भारत की प्राचीन जीवनशैली का अभिन्न अंग है, जिसे आज विश्व स्तर पर पुनः स्वीकार्यता मिल रही है। उन्होंने बताया कि बढ़ते तनाव, अनियमित दिनचर्या, प्रदूषण तथा जीवनशैली विकारों ने आधुनिक मानव के स्वास्थ्य को चुनौती दी है। ऐसे समय में योग, प्राणायाम, प्राकृतिक चिकित्सा, सनातन उपचार-पद्धतियाँ मानवता के लिए आशा की किरण बनकर उभर रही हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ऐसे विषयों पर शोध को प्रोत्साहित करता है और भविष्य में इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की शोध परियोजनाओं को प्रारंभ करने की योजना भी करें।
विशिष्ट अतिथि डॉ० कामाख्या कुमार, निदेशक IQUC, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार ने कहा कि प्राकृतिक एवं वैकल्पिक चिकित्सा का सबसे बड़ा लाभ इसकी सहजता और सुलभता है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोग महंगे आधुनिक उपचारों तक सुगमता से नहीं पहुँच पाते, ऐसे में योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा जैसे उपचार उनके लिए जीवनदायिनी सिद्ध हो सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में व्यावहारिक प्रशिक्षण को और अधिक सशक्त बनाया जाएगा जिससे विद्यार्थी क्षेत्रीय स्तर पर जन-जागरूकता बढ़ाने में भी अग्रणी भूमिका निभा सकें।
सारस्वत अतिथि प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार त्यागी पूर्व विभाग अध्यक्ष गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार ने कहा कि स्वास्थ्य संरक्षण में प्राकृतिक चिकित्सा की भूमिका केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य को दीर्घकालिक रूप से स्थिर करने का माध्यम भी है। उन्होंने बताया कि आज विश्वभर में ‘ड्रग-फ्री हेल्थकेयर’ की अवधारणा पर तेजी से कार्य हो रहा है, और योग-प्राकृतिक चिकित्सा इसमें सबसे महत्वपूर्ण घटक के रूप में स्थापित हो रहे है ।
संगोष्ठी में विषय से संबंधित लगभग 50 शोधार्थियों ने शोध पत्रों का वाचन किया , जिसमें विशेषज्ञों ने प्राकृतिक चिकित्सा, योग चिकित्सा, आयुर्वेद, सुगंध चिकित्सा, जल-चिकित्सा, आहार चिकित्सा, पंचकर्म तथा आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान के समन्वित प्रभावों पर अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए। प्रतिभागियों ने बताया कि निरोग जीवन के लिए प्रकृति आधारित उपचार न केवल सुरक्षित और सहज हैं, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संरक्षण में भी अत्यंत प्रभावी सिद्ध होते हैं।
इस प्रकार कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों द्वारा व्यवहारिक प्रदर्शन भी कराया गया, जिसमें प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत मड थेरेपी, जल-चिकित्सा, सूर्य-चिकित्सा, योगासन एवं प्राणायाम की वैज्ञानिक विधियों को विस्तार से समझाया गया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय डॉ० चंद्रशेखर शर्मा , डॉ० सुमन भट्ट, उपकुलसचिव श्री संदीप भट्ट, सहायक कुलसचिव श्री संदीप कुमार, श्रीमती मीनाक्षी रावत, डॉ० जय कुंवार, दिशांत शर्मा, योगेश कुमार, गोरी, सौरभ शर्मा, राजेंद्र प्रसाद नौटियाल, हिमांशु आदि शोध छात्र, विभिन्न संस्थानों से आए प्रतिनिधि योग प्रशिक्षक तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
