देवभूमि उत्तराखंड को किस राह पर धकेल रही है भाजपा सरकार : करण मेहरा

देहरादून : त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की नस्लीय हिंसा के चलते हुई दर्दनाक मौत सिर्फ़ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि आज के उत्तराखंड की बदली हुई पहचान का दर्पण है। जिस राज्य ने हमेशा शांति, भाईचारे और अतिथि देवो भव की परंपरा को निभाया, वहीं अब छात्रों को उनके चेहरे और रंग देखकर “भारतीय” होने का सबूत माँगा जा रहा है। यह बदलाव संयोग नहीं, भाजपा सरकार की नाकामी का परिणाम है।
अंजेल ने मरने से पहले कहा – “We are Indians… What certificate should we show?”
सोचिए, यह सवाल किसी विदेशी का नहीं था, एक भारतीय छात्र का था, जिसने उत्तराखंड की धरती पर आख़िरी साँसें लेते हुए अपनी भारतीयता सिद्ध करनी पड़ी। और सरकार ? चुप… लाचार… और संवेदनहीन।
आज यह सवाल सिर्फ़ त्रिपुरा या उत्तराखंड का नहीं बल्कि पूरे भारत का है।
क्या इस देश में आगे किसी को जन्म प्रमाणपत्र की तरह “भारतीयता प्रमाणपत्र” भी रखना होगा? क्या भाजपा सरकार बताएगी कि देवभूमि में नस्लीय हिंसा कैसे पनपने लगी?
कहाँ है वह प्रशासन, कहाँ है वह “कठोर कानून-व्यवस्था” ?
भाजपा सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड की पहचान बदली गई है। जहाँ कभी सुरक्षा की भावना थी, वहाँ आज डर और अविश्वास है। जहाँ विविधता सम्मान थी, वहाँ आज नस्लीय तंज़ और हिंसा है। जहाँ युवा सपने लेकर पढ़ने आते थे, वहाँ अब लोग अपनी जान गँवा रहे हैं। क्या उत्तराखंड में अब लोगों की भारतीयता उनके चेहरे देखकर तय होगी? क्या यह वही उत्तराखंड है जिसके लिए हम गर्व महसूस करते थे?
सरकार बताए कि इस हिंसक माहौल के लिए जिम्मेदार कौन है?
आज हम सिर्फ़ न्याय नहीं,
बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कठोर एंटी-रैसिज़्म कानून की माँग कर रहे हैं ताकि भारत के किसी भी कोने में कोई भी छात्र, कोई भी नागरिक अपनी पहचान साबित करने की मजबूरी में, अपनी जान न गंवाए।
यह समय चुप रहने का नहीं बल्कि सवाल पूछने का है।
अंजेल चकमा की चीख हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है और भाजपा सरकार इसकी जवाबदेही से भाग नहीं सकती।

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